सेंट्रल रेलवे मज़दूर संघ (CRMS) और रेलवे प्रशासन के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। मामला तब गरमा गया जब सरकारी रेलवे पुलिस (GRP) ने संघ के दो प्रमुख नेताओं विवेक शिशोदिया और एस.के. दुबे सहित कुछ अज्ञात यूनियन सदस्यों पर एफआईआर दर्ज की। इसके जवाब में CRMS ने चेतावनी दी है कि यदि आरोप वापस नहीं लिए गए, तो मोटरमैन ‘वर्क-टू-रूल’ आंदोलन शुरू कर सकते हैं—एक ऐसा कदम जो मुंबई की जिंदगी की धड़कन कही जाने वाली लोकल ट्रेन सेवाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। (“FIR Dispute Sparks Controversy”)
‘वर्क-टू-रूल’ आंदोलन का अर्थ है कि कर्मचारी केवल अपनी नियमित और निर्धारित जिम्मेदारियाँ ही निभाएँगे, उससे अधिक बिल्कुल नहीं। रेलवे के संचालन में ऐसी स्थिति अत्यंत संवेदनशील होती है, क्योंकि कई बार अचानक तकनीकी दिक्कतों, क्रॉस-ड्यूटी, या दूसरे मोटरमैन उपलब्ध न होने पर कर्मचारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। लेकिन यदि वे ऐसा करने से मना कर दें, तो सेवा का संचालन तुरंत प्रभावित होता है।
मुंबई डिवीजन में फिलहाल 20% से अधिक मोटरमैन पद खाली हैं। यह कमी पहले ही सेवाओं पर दबाव डालती है। ऐसे में यदि कुछ प्रतिशत मोटरमैन भी वर्क-टू-रूल पर चले जाते हैं, तो लोकल ट्रेनें समय से नहीं चल पाएंगी, ट्रेन सेवाओं में देरी और रद्द होने की घटनाएँ बढ़ सकती हैं। रोज लाखों यात्रियों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, खासकर ऑफिस समय में। (“FIR Dispute Sparks Controversy”)
संघ का कहना है कि उसके नेताओं पर एफआईआर “अन्यायपूर्ण” और “दमनकारी” है। CRMS का आरोप है कि प्रशासन यूनियन की गतिविधियों को दबाने की कोशिश कर रहा है। संघ की मांग है कि एफआईआर तुरंत वापस ली जाए और मामले की स्वतंत्र जांच हो। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि मांगों को अनसुना किया गया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
दूसरी ओर, रेलवे प्रशासन का कहना है कि कार्यवाही कानून के अनुसार की गई है। GRP के अनुसार, कुछ यूनियन सदस्यों द्वारा रेलवे परिसर में अनुशासनहीनता और बाधा उत्पन्न करने की शिकायतें मिली थीं। उनका दावा है कि यह कार्रवाई किसी दबाव में नहीं बल्कि परिस्थिति और सबूतों के आधार पर की गई है। (“FIR Dispute Sparks Controversy”)
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद जल्द खत्म नहीं हुआ तो मुंबई उपनगरीय नेटवर्क पर बड़ा बोझ पड़ेगा। एक-एक मिनट की देरी यहाँ हजारों यात्रियों को प्रभावित करती है, ऐसे में वर्क-टू-रूल जैसा कदम सिस्टम को धीमा कर सकता है। पहले भी जब रेलवे कर्मचारियों ने ऐसा आंदोलन किया था, तो लोकल सेवाओं को सामान्य होने में कई दिन लगे थे।
CRMS ने फिलहाल आंदोलन की तिथि घोषित नहीं की है, लेकिन चेतावनी जारी कर दी गई है। यात्रियों में इस खबर को लेकर चिंता बढ़ने लगी है, क्योंकि मुंबई की लोकल पर निर्भरता किसी भी बड़े शहर से कहीं अधिक है। यदि संघ और प्रशासन बीच विवाद का समाधान जल्दी नहीं खोजते, तो आने वाले दिनों में यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, मामला केवल दो यूनियन नेताओं पर दर्ज एफआईआर का नहीं, बल्कि रेलवे कर्मचारियों के मनोबल, प्रशासनिक संवाद और शहर की परिवहन व्यवस्था पर पड़े संभावित असर का है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या बातचीत से समाधान निकलेगा या हालात आंदोलन की ओर बढ़ेंगे।
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