मुंबई में रीडेवलपमेंट का बाजार एक बार फिर गति पकड़ चुका है, लेकिन इस बार समीकरण बदल गए हैं। जहां पहले डेवलपर्स बाज़ी मारते थे, अब कई हाउसिंग सोसायटियाँ ही शर्तें तय कर रही हैं। बिल्डरों की बढ़ती कतार के बीच सोसायटियाँ अधिकतम लाभ लेने के लिए ऊंची मांगें रख रही हैं, जिनमें से कई मौजूदा बाज़ार स्थितियों के अनुकूल नहीं हैं। (Re-development Demand)
बाजार सूत्रों के अनुसार, कई सोसायटियाँ अतिरिक्त क्षेत्र, हार्डशिप कॉम्पनसेशन और विस्थापन राशि जैसी मांगें 15%–25% अधिक रख रही हैं। कई मामलों में वे प्रीमियम सुविधाएं, बड़े कॉर्पस फंड और अतिरिक्त निर्मित क्षेत्र की ऐसी मांगें रख रही हैं जो परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता से मेल नहीं खातीं। विशेषज्ञों के मुताबिक, एक तरह की “हर्ड मेंटैलिटी” ने हालात बिगाड़े हैं—अगर किसी क्षेत्र की एक-दो सोसायटी को ऊंचा प्रस्ताव मिलता है, तो बाकी सोसायटियाँ उसे ही नया मानक मान लेती हैं, जबकि हर प्लॉट की एफएसआई, ज़ोनिंग और लागत अलग होती है।
बांद्रा से जूहू तक की बेल्ट में यह प्रवृत्ति सबसे अधिक देखी जा रही है। यहां कई सोसायटियाँ वैकल्पिक किराए के रूप में ₹225 प्रति वर्ग फुट की मांग कर रही हैं, जबकि वास्तविक बाज़ार दर ₹150–₹175 प्रति वर्ग फुट है। इसी तरह कॉर्पस फंड, जो सामान्यतः ₹3,000–₹3,500 प्रति वर्ग फुट होना चाहिए, उसे ₹4,500–₹5,000 प्रति वर्ग फुट तक मांगा जा रहा है।
खासकर बांद्रा, खार, सांताक्रूज़, अंधेरी और गोरेगांव में रीडेवलपमेंट गतिविधि बढ़ने के साथ अपेक्षाएँ भी तेज़ी से बढ़ी हैं। यहां तक कि बोरीवली और कांदिवली जैसी मिड-सेगमेंट मार्केट वाली जगहों पर भी जूहू और vile parle जैसी मांगें रखी जा रही हैं। (Re-development Demand)
एनैक्स एडवाइजरी के सीईओ संजय डागा का कहना है कि बढ़ती जीवनशैली और aspirational mindset ने सोसायटियों को अधिक लाभ मांगने के लिए प्रेरित किया है। लेकिन डेवलपर्स को निर्माण लागत, भूमि की अर्थव्यवस्था और मार्केट Absorption देखते हुए ही निर्णय लेना पड़ता है।
डेवलपर राम राहेजा के अनुसार, कई टेंडर ऐसे होते हैं जहां संख्याएँ आर्थिक रूप से संभव नहीं होतीं, इसलिए वे वहां से पीछे हट जाते हैं। अक्सर कुछ नए डेवलपर्स रणनीतिक प्रवेश के लिए ऊंचे वादे कर देते हैं, जिनकी वजह से भविष्य में परियोजनाएँ रुक जाती हैं। (Re-development Demand)
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि कई सोसायटियाँ आंशिक जानकारियों के आधार पर फैसले लेती हैं। यदि अपेक्षाएँ और व्यवहार्यता में तालमेल न हो, तो रीडेवलपमेंट अवसर नहीं बल्कि विवाद और देरी का कारण बन जाता है।
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