महाराष्ट्र में मराठी भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने कल्याण-डोंबिवली क्षेत्र में ऑटो-रिक्शा के लिए एक अनोखा ‘स्टिकर अभियान’ शुरू किया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य यात्रियों को यह बताना है कि संबंधित रिक्शा चालक मराठी भाषा जानता है और उसका सम्मान करता है। (MNS Marathi Identity Campaign)
क्या है इस स्टिकर की खासियत?
कल्याण-डोंबिवली में मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा रिक्शाओं पर चिपकाए जा रहे इन स्टिकर्स पर लिखा है: “मी मराठी बोलतो, मला मराठी समजते. माझ्या रिक्षात बसा” (मैं मराठी बोलता हूं, मुझे मराठी समझ आती है। मेरी रिक्शा में बैठें)।
यह मुहिम 4 मई को प्रस्तावित ऑटो-टैक्सी हड़ताल के जवाब में शुरू की गई है, जो मराठी भाषा की अनिवार्यता के विरोध में बुलाई गई है।
मनसे का आक्रामक रुख
मनसे के पदाधिकारियों का कहना है कि महाराष्ट्र में रहकर मराठी भाषा का विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
संदीप देशपांडे का बयान: मनसे नेता संदीप देशपांडे ने स्पष्ट किया कि मराठी अस्मिता के साथ कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जो लोग मराठी की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं, उन्हें मनसे अपनी शैली में उत्तर देगी।
स्थानीय समर्थन: दिलचस्प बात यह है कि इस मुहिम को केवल मराठी भाषी ही नहीं, बल्कि कई परप्रांतीय (प्रवासी) रिक्शा चालकों का भी समर्थन मिल रहा है। कई चालकों ने खुशी-खुशी अपनी रिक्शा पर ये स्टिकर लगवाए और मराठी सीखने की इच्छा जाहिर की। (MNS Marathi Identity Campaign)
राजनीतिक माहौल गर्म
कल्याण-डोंबिवली में मनसे के आरिफ शेख और योगेश पाटील जैसे पदाधिकारियों ने इस अभियान का नेतृत्व किया। रिक्शा चालक शफिउल्लाह जैसे लोगों ने भी इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि वे ग्राहकों से मराठी में संवाद करने के लिए तैयार हैं। 4 मई की हड़ताल और मनसे की इस जवाबी कार्रवाई ने मुंबई से सटे इलाकों में भाषाई राजनीति को और तेज कर दिया है। (MNS Marathi Identity Campaign)
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